13th century, learn how ibn battuta made his world travel

Story of a world traveler

Some people travel for hobbies, and some people for learning. History itself holds some such big travelers. Travelers who measured the world by steps for their curiosity.

कुछ लोग शौक के लिये यात्रा करते हैं, और कुछ लोग सीखने के लिये। इतिहास अपने आप में ऐसे ही कुछ बडे यात्रियों को संजोये हुए है। यात्री जिन्होंने अपनी जिज्ञासा के लिये दुनियाॅ को कदमों से नाप लिया।

Traveling the world at that time was like a fantasy. At present, it is easy for us to travel from one country to another, but in ancient times it was difficult. Traveling was also unsafe. In the 13th century, people had neither wealth nor resources, but the world traveler Ibn Battuta embodied this fantasy on the basis of his passion.

उस समय दुनिया घूमना एक कोरी कल्पना के समान था। वर्तमान में हमें एक देश से दूसरे देश में भ्रमण करना आसान है, परन्तु प्राचीन काल में मुश्किल था। यात्रा करना असुरक्षित भी था। 13वीं शताब्दी में लोगों के पास न तो धन था, और न ही संसाधन, परन्तु विश्व यात्री इब्न बतूता ने अपने जुनून के दम पर इस कल्पना को साकार कर दिया था।

Family of world traveler Ibn Battuta

Ibn Batuta, a world traveler, was born on 24 February 1304 in the city of Tanziar, Morocco. Ibn Batuta, a world traveler, belonged to a religious family. Who was one of the most educated and prosperous families of the time. At a very early age, the world traveler Ibn Battuta had acquired religious and literary education. Ibn Battuta, a world traveler, considered the acquired experience to be a more important source of knowledge.

विश्व यात्री इब्न बतूता का जन्म 24 फरवरी 1304 को मोरक्को के तंजियार शहर में हुआ था। विश्व यात्री इब्न बतुता एक धार्मिक परिवार से सम्बन्ध रखते थे। जो उस समय के सबसे अधिक पढे लिखे और समृद्ध परिवारों में से एक था। बहुत कम उम्र में ही विश्व यात्री इब्न बतूता ने धार्मिक तथा साहित्यिक शिक्षा हासिल कर ली थी। विश्व यात्री इब्न बतूता अर्जित अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्वपूर्ण स्रोत मानता था।

Commencement of travel

Ibn Battuta, a world traveler, belonged to a religious family and also had a desire to know other religions. That is why he started a pilgrimage to Mecca. By 1332–33, he had traveled to the ports of Syria, Iraq, Persia, Yemen, Oman and East Africa.

विश्व यात्री इब्न बतूता धार्मिक परिवार से जुडा था और उसे अन्य धर्मों को जानने की इच्छा भी थी। इसलिये उसने मक्का की तीर्थ यात्रा प्रारम्भ की। वह सन् 1332-33 तक सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के बन्दरगाहों की यात्रा कर चुका था।

The main part of the story of the world traveler

In 1334, Ibn Battuta reached Delhi by land route via Central Asia, Afghanistan via Hind Kush. Here he came to the eyes of Mughal emperors on the basis of his knowledge and gained fame. In 1342, he went to the Mongol ruler as the Sultan’s envoy to China. After this, Ibn Battuta proceeded to the Malabar coast via Central India. From Malbar, Ibn Battuta went to the Maldives, and traveled to Sri Lanka from there.

After coming back from Sri Lanka to Malbar and Maldives, Ibn Battuta also went to Bengal and Assam. Ibn Battuta went to Sumatra by ship and went to the Chinese port city of Jaitun from there. Which today is known as Quanzhu. He traveled widely to China and went as far as Beijing. During this entire journey, Ibn Battuta was robbed several times by the bandits. The bandits’ invasion and the storms killed many of Ibn Battuta’s caravans. But Ibn Battuta went ahead and never gave up. In 1347 he decided to return home.

मध्य एशिया, अफगानिस्तान से होते हुए हिन्द कुश के रास्ते होकर इब्न बतूता सन् 1334 में स्थल मार्ग से दिल्ली पहॅुचा था। यहाॅ वह अपने ज्ञान के आधार पर मुगल बादशाहों की नजरों में आया और ख्याति अर्जित की। सन् 1342 में मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रुप में चीन की ओर प्रस्थान किया। इसके बाद इब्न बतूता मध्य भारत के रास्ते मालबार तट की ओर बढा। मालबार से इब्न बतूता मालद्वीप गया, और वहाॅ से श्री लंका की यात्रा की।

श्री लंका से वापस मालबार और मालद्वीप आकर इब्न बतूता बंगाल तथा असम भी गया। इब्न बतूता जहाज से सुमात्रा गया और वहाॅ से चीनी बंदरगाह नगर जायतुन गया। जो आज क्वानझू के नाम से जाना जाता है। उसने व्यापक रूप से चीन की यात्रा की और बीजिंग तक गया। इस सम्पूर्ण यात्रा के दौरान इब्न बतूता को कई बार डाकुओं द्वारा लूटा गया। डाकुओं के आक्रमण और समुद्री तूफानों ने इब्न बतूता के कारवाॅ के कई यात्रियों की जान ली। पर इब्न बतूता आगे बढता गया और कभी भी हार नहीं मानी। 1347 में उसने वापस अपने घर आने का निश्चय किया।

fyunli.in world traveler
ibn battuta a world traveler

According to Ibn Battuta, it took forty days to travel from Multan to Delhi and about fifty days from Sindh to Delhi. The distance from Daulatabad to Delhi could be forty, while the distance from Gwalior to Delhi could be covered in ten days.

इब्न बतूता के अनुसार उसे मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में चालीस दिन और सिंध से दिल्ली की यात्रा में लगभग पचास दिन का समय लगा। दौलताबाद से दिल्ली की दूरी चालीस, जबकि ग्वालियर से दिल्ली की दूरी दस दिन में तय की जा सकती थी।

World traveler’s homecoming

Ibn Battuta traveled 120,000 kilometers in 30 years and returned to his home in Morocco in 1354. Over the years, Ibn Battuta’s fame had spread everywhere and due to this, there was a big welcome on his return home. On the orders of the Sultan of Morocco, Ibn Battuta gave a book form to the accounts of his travels. This was a beautiful travelogue of that time. Which was named Rihla. In this he was assisted by the court writer Ibn Juzai. In 1368, Ibn Battuta died in Tanjiyar, the motherland.

इब्न बतूता ने 30 वर्ष में 120000 किलोमीटर की यात्रा की और सन् 1354 में अपने घर मोरक्को वापस पहॅुचा। इतने वर्षों में इब्न बतूता की ख्याति हर जगह फैल चुकी थी और इस कारण घर वापसी पर बडा स्वागत हुआ। मोरक्को के सुल्तान के आदेश पर इब्न बतूता ने अपनी यात्रा के किस्सों को एक किताब का रुप दिया। जिसको रिहला नाम दिया गया। इसमें उनकी सहायता दरबारी लेखक इब्न जुजाई ने की। सन् 1368 में मातृभूमि तंजियार में ही इब्न बतूता का देहान्त हो गया।

The urge to know the romance of travel and the culture of other countries, had made Ibn Battuta a nomadic for 30 years.

सफर के रोमाचं और दूसरे देशों की संस्कृति को जानने की ललक ने ही 30 सालों तक खानाबदोश रहे इब्न बतूता को ज्ञानी बना दिया था।

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