सुमित्रानन्दन पन्त की 8 प्रसिद्ध कवितायें sumitranandan pant 8 poems in hindi

सुमित्रानन्दन पन्त की 8 प्रसिद्ध कवितायें sumitranandan pant 8 poems in hindi

सुमित्रानन्दन पन्त sumitranandan pant fyunli.in
सुमित्रानन्दन पन्त sumitranandan pant fyunli.in

सुमित्रानन्दन पन्त sumitranandan pant का नाम हिन्दी साहित्य के महानतम् कवियों में से एक है। उनकी कवितायें आज भी विद्यालयी शिक्षा का एक अभिन्न अंग हैं। साथ ही सुमित्रानन्दन पन्त की कवितायें हमारे जीवन के लिये एक पथ-प्रदर्शक भी हैं।

आइये पढते हैं हिन्दी के महान कवि सुमित्रानन्दन पन्त की 8 प्रसिद्ध कवितायें sumitranandan pant poems in hindi

अमर स्पर्श-by-sumitranandan pant

खिल उठा हृदय,
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय!
खुल गए साधना के बंधन,
संगीत बना, उर का रोदन,
अब प्रीति द्रवित प्राणों का पण,
सीमाएॅ अमिट हुईं सब लय।
क्यों रहे न जीवन में सुख दुख
क्यों जन्म मृत्यु से चित्त विमुख?
तुम रहो दृगों के जो सम्मुख
प्रिय हो मुझको भ्रम भय संशय!
तन में आएॅ शैेशव यौवन
मन में हों विरह मिलन के वण,
युग स्थितियों से प्रेरित जीवन
उर रहे प्रीति में चिर तन्मय!
जो नित्य अनित्य जगत का क्रम
वह रहे, न कुछ बदले, हो कम,
हो प्रगति ह्रास का भी विभ्रम,
जग से परिचय, तुमसे परिणय!
तुम सुंदर से बन अति सुंदर
आओ अंतर में अंतरतर,
तुम विजयी जो, प्रिय हो मुझ पर
वरदान, पराजय हो निश्चय!

याद by-sumitranandan pant

बिदा हो गई साँझ, विनत मुख पर झीना आँचल धर,
मेरे एकाकी आँगन में मौन मधुर स्मृतियाँ भर!
वह केसरी दुकूल अभी भी फहरा रहा क्षितिज पर,
नव असाढ के मेघों से घिर रहा बराबर अंबर!

मैं बरामदे में लेटा, शैय्या पर, पीडित अवयव,
मन का साथी बना बादलों का विषाद है नीरव!
सक्रिय यह सकरुण विषाद, मेघों से उमड़ उमड़ कर
भावी के बहु स्वप्न, भाव बहु व्यथित कर रहे अंतर!

मुखर विरह दादुर पुकारत उत्कंठित भेकी को,
बर्हभार से मोर लुभाता मेघ-मुग्ध केकी को,
आलोकित हो उठता सुख से मेघों का नभ चंचल,
अंतरतम में एक मधुर स्मृति जग जंग उठती प्रतिपल!

कम्पित करता वक्ष धरा का घन गभीर गर्जन स्वर,
भू पर ही आ गया उतर शत धाराओं में अंबर!
भीनी भीनी भाप सहज ही साँसों में घुल मिल कर
एक और भी मधुर गंध से हृदय दे रही है भर!

नव असाढ की संध्या में, मेघों के तम में कोमल,
पीडित एकाकी शय्या पर, शत भावों से विह्वल,
एक मधुरतम स्मृति पल भर विद्युत सी जल कर उज्जवल
याद दिलाती मुझे हृदय में रहती जो तुम निश्चल!

– यह रचना सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा सन् 1939 के जुलाई माह में लिखी गई थी।

आजाद by-sumitranandan pant

पैगम्बर के एक शिष्य ने
पूछा, ‘हजरत बंदे को शक
है आजाद कहाँ तक इंसा
दुनिया में, पाबन्द कहाँ तक?‘

‘खडे रहो!‘ बोले रसूल तब
‘अच्छा पैर उठाओ उपर‘
‘जैसा हुक्म!‘ मुरीद सामने
खडा हो गया एक पैर पर!

‘ठीक, दूसरा पैर उठाओ‘
बोले हँस कर नबी फिर तुरत,
बार बार गिर, कहा शिष्य ने
‘यह तो नामुमकिन है हजरत‘

‘हो आजाद यहाँ तक, कहता
तुमसे एक पैर उठ उपर,
बंधे हुए दुनियाँ से, कहता
पैर दूसरा अडा जमीं पर!‘-
पैगम्बसर का था यह उत्तर!

मोह by-sumitranandan pant

छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया,
तोड प्रकृति से भी माया
बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दँू लोचन?
भूल अभी से इस जग को!

तज कर तरल-तरंगों को
इन्द्र-धनुष के रंगों को
तेरे भ्रू-भंगों से कैसे बिंधवा दँू निज मृग-सा मन?
भूल अभी से इस जग को!

कोयल का वह कोमल-बोल
मधुकर की वीणा अनमोल
कह, तब तेरे ही प्रिय-स्वर से कैसे भर लँू सजनि! श्रवन?
भूल अभी से इस जग को!

ऊषा-सस्मित किसलय-दल
सुधा रश्मि से उतरा जल
ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दँू जीवन?
भूल अभी से इस जग को

सुख-दुख by-sumitranandan pant

झर पड़ता जीवन डाली से
मैं पतझड़ का-सा जीर्ण-पात!-
केवल, केवल जग-कानन में
लाने फिर से मधु का प्रभात!

मधु का प्रभात!-लद लद जाती
वैभव से जग की डाल-डाल
कलि-कलि किसलय में जल उठती
सुन्दरता की स्वर्णीय-ज्वाल!

नव मधु-प्रभात!-गँूजते मधुर
उस-उर में नव आशाभिलाष,
सुख-सौरभ, जीवन-कलरव से
भर जाता सूना महाकाश!

आः मधु-प्रभात!-जग के तम में
भरती चेतना अमर प्रकाश,
मुरझाए मानस-मुकुलों में
पाती नव मानवता विकास!

मधु-प्रात! मुक्त नभ में सस्मित
नाचती धरित्री मुक्त-पाश!
रवि-शशि केवल साक्षी होते
अविराम प्रेम करता प्रकाश!

मैं झरता जीवन डाली से
साह्लाद, शिशिर का शीर्ण पात!
फिर से जगती के कानन में
आ जाता नवमधु का प्रभात!

जग के उर्वर आँगन में by-sumitranandan pant

जग के उर्वर-आँगन में
बरसो ज्योतिर्मय जीवन!
बरसो लघु-लघु तृण, तरु पर
हे चिर-अव्यय, चिर-नूतन!

बरसो कुसुमों में मधु बन,
प्राणों में अमर प्रणय-धन,
स्मिति-स्वप्न अधर-पलकों में,
उर-अंगों में सुख-यौवन!

छू-छू जग के मृत रज-कण
कर दो तृण-तरु में चेतन,
मृन्मरण बाँध दो जग का,
दे प्राणों का आलिंगन!

बरसो सुख बन, सुखमा बन,
बरसो जग-जीवन के घन!
दिशि-दिशि में औ पल-पल में
बरसो संसृति के सावन!

– यह रचना सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा सन् 1930 के जून माह में लिखी गई थी।

दो लडके by-sumitranandan pant

मेरे आँगन में, टीले पर है मेरा घर
दो छोटे से लडके आ जाते हैं अकसर।

नंगे तन, गदबदे, साँवले, सहज छबीले,
मिट्टी के मटमैले पुतले, पर फुर्तीले।

जल्दी से टीले के नीचे उधर, उतरकर
वे चुन ले जाते कूडे से निधियाँ सुन्दर

सिगरेट के खाली डिब्बे, पन्नी चमकीली,
फीतों के टुकडे, तस्वीरें नीली-पीली

मासिक पत्रों के कवरों की, और बन्दर से
किलकारी भरते हैं, खुश हो-हो अन्दर से।

दौड पार आँगन के फिर हो जाते ओझल
वे नाटे छः सात साल के लडके मांसल

सुन्दर लगती नग्न देह, मोहती नयन-मन,
मानव के नाते उर में भरता अपनापन!

मानवे के बालक हैं ये पासी के बच्चे
रोम-रोम मानव के साँचे में ढाले सच्चे।

अस्थि-मांस के इन जीवों की ही यह जग घर,
आत्मा का अधिवास न यह-वह सूक्ष्म, अनश्वर!

न्यौछावर है आत्मा नश्वर रक्त-मांस पर,
जग का अधिकारी है वह, जो है दुर्बलतर!

वह्नि, बाढ, उल्का, झंझा की भीषण भू पर
कैसे रह सकता है कोमल मनुज कलेवर?

निष्ठुर है जड़ प्रकृति, सहज भंगुर जीवित जन,
मानव को चाहिए जहाँ, मनुजाचित साधन!

क्यों न एक हों मानव-मानव सभी परस्पर
मानवता निर्माण करें जग में लाकोत्तर।

जीवन का प्रासाद उठे भू पर गौरवमय,
मानव का साम्रााज्य बने, मानव-हित निश्चय।

जीवन की क्षण-धूलि रह सके जहाॅ सुरक्षित,
रक्त-मांस की इच्छाएं जन की हों पूरित!

मनुज प्रेम से जहाँ रह सके मानव ईश्वर!
और कौन सा स्वर्ग चाहिये तुझे धरा पर।

बसन्त by-sumitranandan pant

चंचल पग दीप-शिखा से धर
गृह, मग, वन में आया वसन्त!
सुलगा फाल्गुन का सूनापन
सौन्दर्य-शिखाओं में अनन्त!

सौरभ की शीतल ज्वाला से
फैला उर-उर में मधुर दाह
आया वसन्त, भर पृथ्वी पर
स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह!

पल्लव-पल्लव में नवल रुधिर
पत्रों में मांसल-रंग खिला,
आया नीली-पीली लौ से
पुष्पों के चित्रित दीप जला!

अधरों की लाली से चुपके
कोमल गुलाब के गाल लजा,
आया, पंखुडियों को काले-
पीले धब्बों से सहज सजा!

कलि के पलको में मिलन-स्वप्न,
अलि के अन्तर में प्रणय-गान
लेकर आया, प्रेमी वसन्त,-
आकुल जड़-चेतन स्नेह-प्राण!

काली कोकिल! सुलगा उर में
स्वरमयी वेदना का अंगार,
आया वसन्त, घोषित दिगनत
करती भव पावक की पुकार!

आः! प्रिये! निखिल ये रूप-रंग
रिल-मिल अन्तर में स्वर अनन्त
रचते सजीव जो प्रणय-मूर्ति
उसकी छाया, आया वसन्त!

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